Exclusive Report: जयपुर डिस्कॉम का बड़ा एक्शन: 237 करोड़ के GSS घोटाले में दागी फर्म ब्लैकलिस्ट, दोषी कंपनी से होगी वसूली

By Admin

जयपुर | राजस्थान के ऊर्जा विभाग में भ्रष्टाचार के ‘हाई-वोल्टेज’ खेल का पर्दाफाश करते हुए जयपुर डिस्कॉम ने निर्णायक कार्रवाई शुरू कर दी है। बहुचर्चित 237 करोड़ रुपये के जीएसएस (GSS) घोटाले की मुख्य आरोपी फर्म मैसर्स आर.सी. पावर प्रोजेक्ट लिमिटेड (पूर्व में आर.सी. एंटरप्राइजेज) के खिलाफ विभाग ने अब तक की सबसे बड़ी घेराबंदी की है। 10 फरवरी, 2026 को जारी आधिकारिक आदेश के बाद अब कंपनी के अधूरे छोड़े गए जीएसएस का कार्य ‘रिस्क एण्ड कॉस्ट’ (Risk and Cost) के आधार पर पूरा कराया जाएगा।

दोषी कंपनी से होगी वसूली और 3 साल का बैन

अधीक्षक अभियंता (TW) द्वारा जारी आदेश (क्रमांक 1455) के साथ ही फर्म मैसर्स आर.सी. पावर प्रोजेक्ट लिमिटेड का ‘वनवास’ शुरू हो गया है। फर्म को अगले 3 साल के लिए किसी भी सरकारी निविदा प्रक्रिया से प्रतिबंधित (ब्लैकलिस्ट) कर दिया गया है। इसके साथ ही, अधूरे पड़े 31 जीएसएस के कार्यों को एआरसी (ARC) या नई निविदा के माध्यम से तुरंत आवंटित करने के निर्देश दिए गए हैं। ‘रिस्क एंड कॉस्ट’ प्रावधान के तहत इन कार्यों को पूरा करने में आने वाला जो भी अतिरिक्त खर्च होगा, वह इसी दोषी कंपनी से वसूला जाएगा। विभाग ने जनता को बिजली संकट से बचाने के लिए इस मामले को “अत्यंत महत्वपूर्ण और तत्काल” (Urgent and Important) श्रेणी में रखते हुए त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

साज़िश की पटकथा: चहेती फर्म के लिए बिछाया गया था ‘रेड कारपेट’

इस महा-घोटाले की शुरुआत पूर्ववर्ती सरकार के अंतिम दौर में हुई थी, जहाँ 42 जीएसएस निर्माण के नाम पर सरकारी खजाने की लूट की एक सोची-समझी योजना बनाई गई। निविदा प्रक्रिया में चहेती फर्म को काम दिलाने के लिए ‘बूट मॉडल’ जैसी विशेष शर्त जोड़ी गई, जो आरटीटीपी (RTTP) एक्ट का खुला उल्लंघन था। प्रतिस्पर्धा कम करने के लिए एक ही टेंडर को दो हिस्सों (20 और 22 जीएसएस) में बांट दिया गया। मिलीभगत का आलम यह था कि बिड मूल्यांकन कमेटी ने आंखें मूंद लीं और फर्म को बाजार दर से 246 प्रतिशत अधिक ऊंची दरों पर काम सौंप दिया गया।

जांच दबाने का खेल और प्रशासनिक प्रहार

घोटाले की गूंज उठने पर जांच रिपोर्ट तैयार हुई, लेकिन उसे रसूखदार नेताओं और अफसरों की जुगलबंदी के कारण दो महीने तक सार्वजनिक नहीं होने दिया गया। दूदू, दौसा और सवाई माधोपुर के रसूखदार नेताओं ने जांच रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया ताकि रिपोर्ट दबी रहे और कंपनी काम जारी रखकर भुगतान लेने की हकदार बनी रहे। फरवरी 2024 में जब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी, तब विभाग में हड़कंप मचा। अंततः डिस्कॉम ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 5 फरवरी 2025 को चार दिग्गज अफसरों—पूर्व एमडी आर.एन. कुमावत, वित्त निदेशक एस.एन. माथुर, और मुख्य अभियंता आर.के. मीणा व अनिल गुप्ता को चार्जशीट थमाई। हालाँकि, तत्कालीन तकनीकी निदेशक के.पी. वर्मा को गवाह बनाने के नाम पर चार्जशीट से बाहर रखने पर विवाद अब भी जारी है।

हाईकोर्ट से लगा न्यायिक झटका

कंपनी ने डिस्कॉम के टर्मिनेशन नोटिस के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट की शरण ली थी, लेकिन अदालत ने भी इस मामले में बड़े भ्रष्टाचार के डिस्कॉम के स्टैंड को सही माना। जस्टिस प्रवीण भटनागर की एकल पीठ ने डिस्कॉम की प्रक्रिया को वैध मानते हुए कंपनी की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट माना कि इस प्रकरण में राजकोष को भारी नुकसान पहुँचने की आशंका है और इस पूरी कथित योजना की वास्तविक लाभार्थी केवल कंपनी ही है। इस न्यायिक झटके के बाद डिस्कॉम ने फर्म के खिलाफ ‘रिस्क एंड कॉस्ट’ वसूली की कार्रवाई तेज कर दी है।

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