धौलपुर, धौलपुर के चंबल मुक्तिधाम से सोमवार को एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने समाज की पुरानी रूढ़ियों को पीछे छोड़ दिया। यहाँ एक बेटी ने अपनी 85 वर्षीय बुजुर्ग मां के निधन पर पुत्र का फर्ज निभाते हुए न केवल उन्हें कंधा दिया, बल्कि वैदिक रीति-रिवाज के साथ मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई भी दी।
भाई नहीं था, तो बेटी बनी सहारा
चितौरा गांव की रहने वाली रीता ने बताया कि उनके कोई भाई नहीं है। उनकी दो अन्य बहनें रेखा और रुक्मणी हैं। करीब 14 साल पहले पिता के निधन के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। रीता ने आरोप लगाया कि पिता की मौत के बाद ताऊ के बेटों ने जमीन पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद वह अपनी बुजुर्ग मां कमला देवी को अपने साथ अपने ससुराल ले आई थीं।
5 साल तक चारपाई पर की मां की सेवा
मां और बेटी का रिश्ता सेवा और समर्पण की मिसाल बन गया। रीता ने बताया कि पिछले 5 सालों से मां की तबीयत काफी खराब थी। वह चलने-फिरने में भी असमर्थ थीं, ऐसे में रीता ने दिन-रात उनकी सेवा की। सोमवार को जब मां ने अंतिम सांस ली, तो रीता ने समाज की परवाह किए बिना वह जिम्मेदारी उठाई जो आमतौर पर बेटों को दी जाती है।
“मेरी छोटी बेटी ही करे अंतिम संस्कार”
रीता ने भावुक होते हुए बताया कि मां कमला देवी का उनसे विशेष लगाव था। मां ने जीवित रहते ही अपनी अंतिम इच्छा जाहिर की थी कि उनका अंतिम संस्कार उनकी सबसे छोटी बेटी रीता द्वारा ही किया जाए। मां के इसी स्नेह और उनकी आखिरी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए रीता ने चंबल मुक्तिधाम पर चिता को मुखाग्नि दी।
“सनातन और वैदिक पद्धति के अनुसार ही मां का क्रिया-कर्म और आगे की रस्में निभाई जाएंगी। मां ने मुझे बेटे से बढ़कर प्यार दिया, तो यह मेरा फर्ज था कि मैं उनके अंतिम सफर में पुत्र बनकर साथ रहूं।” – रीता, मृतका की पुत्री
मुक्तिधाम पर हर आंख हुई नम
चंबल मुक्तिधाम पर मौजूद लोग बेटी के इस साहस और समर्पण को देखकर भावुक हो गए। समाज में अक्सर बेटों को ही अंतिम संस्कार का हकदार माना जाता है, लेकिन रीता के इस कदम ने यह संदेश दिया कि बेटियां भी वंश और फर्ज को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं।
