जयपुर, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) के ‘डाइनिंग इन द स्टार्स’ सेशन में प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक और लेखिका अनुपमा चोपड़ा ने शिरकत की। इस दौरान उन्होंने फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यू, बॉलीवुड के बदलते मिजाज और ओटीटी (OTT) बनाम सिनेमा के भविष्य पर खुलकर अपनी राय रखी।
एक्टर्स को भगवान की तरह पूजने की परंपरा आज भी कायम
सेलिब्रिटी कल्चर और पैपराजी (Paparazzi) के बढ़ते दखल पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए अनुपमा ने कहा कि भारत में एक्टर्स के प्रति दीवानगी का इतिहास पुराना है। उन्होंने कहा, “एक समय था जब देश में पौराणिक फिल्में बनती थीं और कलाकार भगवान का किरदार निभाते थे। तब से ही दर्शकों में कलाकारों को बड़े स्तर पर मान-सम्मान देने और उनके बारे में सब कुछ जानने की इच्छा पैदा हुई।” अनुपमा के अनुसार, वही परंपरा आज भी जारी है, जिसके कारण एक्टर्स चाहकर भी लोगों की नजरों से छिप नहीं पाते।
कंटेंट ही असली बादशाह है
बॉलीवुड में टिके रहने के फॉर्मूले पर बात करते हुए अनुपमा ने साफ किया कि आज ‘कंटेंट ही असली किंग’ है। उन्होंने कहा कि कई दशकों के करियर के बाद भी अगर कोई एक्टर दर्शकों को सिनेमाघर तक खींच पा रहा है, तो उसके पीछे केवल यूनीक कंटेंट है। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “अगर कंटेंट में दम नहीं है, तो दर्शक उन एक्टर्स के पीछे नहीं भागते।”
’12वीं फेल’ की सफलता का दिया उदाहरण
अनुपमा ने अपने पति और मशहूर फिल्ममेकर विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ’12वीं फेल’ का जिक्र करते हुए कहा कि बेहतरीन कंटेंट की वजह से ही दर्शक इस फिल्म को देखने थिएटर तक खिंचे चले आए। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जहाँ फिल्ममेकर रिस्क लेने से डरते हैं और सीधे ओटीटी का रुख करते हैं, वहीं अच्छी कहानियाँ सिनेमा की ताकत बनी हुई हैं।
सिनेमा बनाम ओटीटी: क्या थिएटर खत्म हो जाएंगे?
ओटीटी के आने से सिनेमा के अस्तित्व पर मंडराते खतरों को अनुपमा ने सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा:
“सिनेमा कभी खत्म नहीं होगा। अगर कंटेंट अच्छा है, तो लोग ₹300 का टिकट भी लेंगे और समोसा-पॉपकॉर्न खाकर फिल्म का आनंद भी लेंगे। ओटीटी ने सिनेमा का विस्तार किया है, उसे खत्म नहीं किया।”
