अजमेर: महाशिवरात्रि (Mahashivratri 2026) के पावन पर्व पर राजस्थान में शिव भक्ति की बयार बह रही है। आज हम आपको प्रदेश के एक ऐसे अनोखे और चमत्कारिक मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जो आस्था और रहस्य का अद्भुत संगम है। यह है अजमेर स्थित ‘झरनेश्वर महादेव मंदिर’ (Jharneshwar Mahadev Mandir)। अरावली की पहाड़ियों और प्राकृतिक झरनों के बीच स्थित यह मंदिर करीब 600 साल पुराना है।
बाल रूप में दर्शन देते हैं भोलेनाथ
आमतौर पर शिवालयों में भगवान शिव के रौद्र या सौम्य रूप की पूजा होती है, लेकिन झरनेश्वर महादेव की खासियत यह है कि यहां महादेव ‘बाल रूप’ में विराजमान हैं। यही कारण है कि अजमेर शहर में प्रतिदिन सबसे पहले पूजा-अर्चना इसी मंदिर में शुरू होती है, क्योंकि घर के बड़ों से पहले बच्चों को भोग और पूजा का अधिकार दिया जाता है।

कुण्ड का रहस्य: अपने आप ऊपर आ जाता है पानी
मंदिर का नाम ‘झरनेश्वर’ इसलिए पड़ा क्योंकि यहां पहाड़ से एक प्राकृतिक बरसाती झरना बहता रहता है।
- चमत्कारी कुण्ड: साल भर बहने वाला यह पानी एक कुण्ड में एकत्र होता है। इस कुण्ड की विशेषता यह है कि जलस्तर कम होते ही पानी स्वतः ही ऊपर आ जाता है। यह जल स्रोत कभी सूखता नहीं है।
जितनी बार पूजा, उतनी बार अलग श्रृंगार
इस मंदिर की परंपरा बेहद अनूठी है। दिन में जितनी बार भी महादेव की पूजा-अर्चना की जाती है, उतनी बार उनका अलग-अलग और भव्य श्रृंगार किया जाता है। भक्त इस अद्भुत दर्शन के लिए घंटों इंतजार करते हैं।
सम्राट पृथ्वीराज चौहान की आस्था का केंद्र
इतिहास के पन्नों में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है। बताया जाता है कि मंदिर की वर्तमान संरचना मराठा काल में स्थापित की गई थी, लेकिन यह स्थान उससे भी प्राचीन है। जनश्रुति के अनुसार, अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान भी यहां आकर भगवान शिव की विशेष पूजा किया करते थे।
पहाड़ी का रास्ता और भक्तों की भीड़
भक्तों को मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब आधा किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता तय करना पड़ता है। महाशिवरात्रि और सावन के सोमवार पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
