नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 8 की पुरानी सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से अदालती फैसलों के खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग की गई थी। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी फैसले के बारे में अपनी राय जाहिर करना गलत नहीं है। इस याचिका पर सीजेआइ (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच सुनवाई कर रही थी।
क्या थी विवादित टिप्पणी?
याचिका में 8वीं कक्षा की पुरानी सामाजिक विज्ञान की किताब में लिखी एक विशिष्ट टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई गई थी। किताब में लिखा था: ‘हाल के फैसले झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वालों को शहर में अतिक्रमणकारी के तौर पर देखा जाता है’। याचिकाकर्ता का तर्क था कि ऐसी टिप्पणियां न्यायपालिका की छवि को प्रभावित कर सकती हैं।
सीजेआइ की अहम टिप्पणियां: ‘यह एक स्वस्थ आलोचना है’
सुनवाई के दौरान सीजेआइ सूर्यकांत ने न्यायपालिका की आलोचना को लेकर बेहद उदार और स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने कहा:
- “यह किसी फैसले के बारे में एक नजरिया है और यह एक स्वस्थ आलोचना (Healthy Criticism) है।”
- “न्यायपालिका को इस बारे में ज्यादा संवेदनशील क्यों होना चाहिए?”
- “किताब का यह हिस्सा बताता है कि न्यायपालिका की बनावट कैसी है और वह कैसे काम करती है। लोगों को हमारे फैसलों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है।”
सीजेआइ ने आगे कहा कि किसी अदालती फैसले के बारे में लोगों की राय सही या गलत हो सकती है। अंततः अदालत ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अब इस बदलाव का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि यह पुस्तक सिर्फ 2015-16 के शैक्षणिक सत्र में पढ़ाई जा रही थी।
‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय की होगी समीक्षा
इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को एक बड़ा अपडेट दिया। सरकार ने बताया कि कक्षा 8 की किताब में शामिल ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से जुड़े अध्याय की विस्तृत समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया गया है।
समिति के प्रमुख सदस्य: इस विशेषज्ञ समिति में देश के जाने-माने कानूनविद शामिल किए गए हैं:
- पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल
- सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज इंदु मल्होत्रा
- सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस
