नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मानवता और कानून के बीच संतुलन बिठाते हुए एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो भारत के न्यायिक इतिहास में मिसाल बनेगा। कोर्ट ने गाजियाबाद के 31 वर्षीय युवक हरीश राणा को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की मंजूरी दे दी है। हरीश पिछले 13 वर्षों से कोमा में हैं और पूरी तरह से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर हैं।
हादसे ने बदल दी टॉपर की जिंदगी
हरीश राणा, जो कभी पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक के टॉपर हुआ करते थे, 20 अगस्त 2013 को चंडीगढ़ में अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे ने उनके सिर में गंभीर चोट पहुंचाई, जिससे वे क्वाड्रिप्लेजिया (पूरे शरीर का लकवा) का शिकार हो गए। तब से वे न कुछ बोल सकते हैं, न महसूस कर सकते हैं; केवल मशीनों के सहारे उनकी सांसें चल रही हैं।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां: शेक्सपीयर और गरिमा का जिक्र
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस संवेदनशील मामले पर फैसला सुनाते हुए कई दार्शनिक बातें कहीं:
- शेक्सपीयर का हवाला: कोर्ट ने “To be or not to be” (होना या न होना) का जिक्र करते हुए कहा कि जब रिकवरी की कोई उम्मीद न हो, तो मरीज को कष्ट देना उचित नहीं है।
- एम्स (AIIMS) को निर्देश: कोर्ट ने एम्स को निर्देश दिया कि हरीश के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध (Step-by-step) तरीके से हटाया जाए, ताकि उनकी मृत्यु गरिमापूर्ण हो।
- चिकित्सा का उद्देश्य: कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर का कर्तव्य इलाज करना है, लेकिन जब विज्ञान हार जाए, तो मरीज के सर्वोत्तम हित में फैसला लेना जरूरी है।
क्या होती है पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia)?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत में केवल पैसिव यूथेनेशिया ही वैध है। इसका अर्थ है मरीज को जीवित रखने के लिए दिए जा रहे बाहरी इलाज (जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब) को रोक देना ताकि प्राकृतिक मौत हो सके। ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ (इंजेक्शन देकर मारना) भारत में अभी भी हत्या की श्रेणी में आता है।
परिवार की आर्थिक और मानसिक टूट
हरीश के पिता अशोक राणा ने भावुक होकर कहा, “कोई माता-पिता अपने बेटे के लिए ऐसा नहीं चाहते, लेकिन उसे तिल-तिल मरते देखना असहनीय था।” पिछले 13 सालों में परिवार का सारा पैसा इलाज और नर्सिंग में खर्च हो गया। आर्थिक तंगी और बेटे की लाइलाज हालत ने उन्हें कोर्ट की शरण लेने पर मजबूर किया।
इच्छामृत्यु (Euthanasia) के प्रकार: एक नजर में
नियम: बिना ‘लिविंग विल’ के कैसे मिलती है इजाजत?
हरीश के मामले में कोई ‘लिविंग विल’ नहीं थी। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के नियमों का पालन किया गया:
- अस्पताल के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट।
- कलेक्टर द्वारा गठित एक्सपर्ट बोर्ड की जांच।
- ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट का अंतिम निरीक्षण और सहमति।
