Rajasthan: मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से पर्यावरण प्रेमी संतों एवं प्रबुद्धजनों ने की मुलाकात, खेजड़ी संरक्षण के कानून की घोषणा के लिए जताया आभार

राजस्थान के कल्पवृक्ष और राज्य वृक्ष खेजड़ी को बचाने के लिए चल रहा जन-आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। बीकानेर में पांच दिनों से जारी भूख हड़ताल और ‘महापड़ाव’ के दबाव के बीच मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने विधानसभा में खेजड़ी संरक्षण के लिए एक विशिष्ट और सख्त कानून लाने की घोषणा की है। इस कानून के तहत खेजड़ी को काटने पर भारी जुर्माने और सजा का प्रावधान किया जाएगा।

आंदोलन की आग और सरकार का झुकाव

बीकानेर कलेक्ट्रेट पर बिश्नोई समाज के संतों और पर्यावरण प्रेमियों का बड़ा आंदोलन (खेजड़ी बचाओ आंदोलन) चल रहा था। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं (Solar Projects) के नाम पर पिछले एक दशक में करीब 50 लाख पेड़ काटे गए हैं। जब भूख हड़ताल पर बैठे संतों की तबीयत बिगड़ने लगी, तो राज्य सरकार हरकत में आई।

विधानसभा में मुख्यमंत्री का बड़ा वादा

मुख्यमंत्री ने राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए कहा:

“खेजड़ी हमारी संस्कृति और पहचान का प्रतीक है। हम संतों की मंशा के अनुरूप शीघ्र ही एक मसौदा तैयार कर विधानसभा में विधेयक लाएंगे। यह कानून पूरे प्रदेश में प्रभावी होगा ताकि कोई भी इस कल्पवृक्ष को नुकसान न पहुँचा सके।”

प्रस्तावित कानून के मुख्य संभावित बिंदु:

  1. भारी जुर्माना: पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने प्रत्येक पेड़ काटने पर 1 लाख रुपये के जुर्माने की मांग की है, जिसे कानून में शामिल किया जा सकता है।
  2. गैर-जमानती अपराध: खेजड़ी की अवैध कटाई को गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है।
  3. सोलर कंपनियों पर नकेल: सौर ऊर्जा पार्कों के लिए भूमि आवंटन के समय खेजड़ी के पेड़ों की गिनती और उनकी सुरक्षा अनिवार्य होगी।
  4. राज्यव्यापी प्रतिबंध: जोधपुर और बीकानेर संभाग के बाद अब इसे पूरे राजस्थान में समान रूप से लागू किया जाएगा।

संतों ने खत्म की भूख हड़ताल, लेकिन आंदोलन जारी

मुख्यमंत्री की घोषणा और राज्यमंत्री के.के. बिश्नोई के लिखित आश्वासन के बाद संतों ने अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल तो समाप्त कर दी है, लेकिन उनका ‘महापड़ाव’ तब तक जारी रहेगा जब तक कि विधानसभा में यह बिल पास नहीं हो जाता। मुकाम पीठाधीश्वर रामानंद जी महाराज और अन्य संतों ने मुख्यमंत्री का आभार जताते हुए कहा कि 1730 के खेजड़ली बलिदान की यादें आज भी ताजा हैं और समाज पर्यावरण की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएगा।

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