वन विभाग में ‘गृहयुद्ध’: 17 करोड़ के राजगढ़ घोटाले में अपनों को बचाने में जुटा मुख्यालय, CCF का बड़ा खुलासा

जयपुर: राजस्थान के वन विभाग में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई को लेकर एक अभूतपूर्व प्रशासनिक ‘गृहयुद्ध’ छिड़ गया है। यह विवाद अलवर जिले के बहुचर्चित 17 करोड़ रुपये के राजगढ़ पौधारोपण घोटाले को लेकर है, जहाँ जाँच अधिकारी दोषियों को सजा दिलाने की वकालत कर रहे हैं, वहीं विभाग का शीर्ष नेतृत्व कथित तौर पर उन्हें संरक्षण देने में जुटा है।

सीसीएफ का ‘लेटर बम’ और तीखे आरोप

इस पूरे मामले का खुलासा मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) राजीव चतुर्वेदी के 12 मार्च 2026 के एक ‘लेटर बम’ से हुआ। उन्होंने विभाग के मुखिया, कार्यवाहक प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) पवन कुमार उपाध्याय पर सीधे और गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्र में दावा किया गया है कि 17 करोड़ रुपये के गबन की पुष्टि होने के बावजूद मुख्यालय ने छह महीने तक एफआईआर का प्रस्ताव दबाए रखा।

जाँच अधिकारी को हटाया, जूनियर को कमान

लेटर बम के महज चार दिन बाद (16 मार्च 2026) मुख्यालय ने दागी अफसरों पर कार्रवाई करने के बजाय जाँच अधिकारी राजीव चतुर्वेदी को ही केस से बेदखल कर दिया। अब यह जाँच एक जूनियर अधिकारी को सौंप दी गई है। विभाग का तर्क है कि चतुर्वेदी का तबादला नवंबर 2025 में हो चुका था, लेकिन सवाल यह है कि चार महीने बाद अचानक मुख्यालय को यह तबादला तब क्यों याद आया जब उन पर भ्रष्टाचार को ढंकने के सीधे आरोप लगे?

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना इस पूरे घटनाक्रम में माननीय उच्चतम न्यायालय के तीन बड़े फैसलों के उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं:

  1. ललिता कुमारी केस (2014): संज्ञेय अपराध पर तत्काल एफआईआर अनिवार्य है, लेकिन यहाँ फिर से विभागीय जाँच का सहारा लिया जा रहा है।
  2. विनीत नारायण एवं सुब्रमण्यम केस: जाँच अधिकारियों का मनमाना तबादला प्रतिबंधित है, फिर भी चतुर्वेदी को रातों-रात हटाया गया।
  3. सुब्रमण्यम स्वामी केस (2012): भ्रष्टाचार मामलों में 3-4 माह में अभियोजन स्वीकृति देना अनिवार्य है, जबकि यहाँ फाइल छह महीने से लंबित है।

क्या था राजगढ़ घोटाला?

अलवर के राजगढ़ में मजदूरों के नाम पर पैसा निकाला गया, जबकि पौधारोपण के लिए खुदाई मशीनों से की गई थी। यह मामला वन मंत्री संजय शर्मा (जो अलवर के ही विधायक हैं) की जानकारी में भी है, फिर भी अरण्य भवन की चुप्पी विभाग की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े कर रही है।

जिम्मेदारों के गोलमोल जवाब

जब इस विषय पर पीसीसीएफ पवन कुमार उपाध्याय से पूछा गया, तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “जवाब एसीएस और मंत्री जी ही देंगे।”

वहीं, तत्कालीन डीएफओ अपूर्ण कृष्ण श्रीवास्तव ने अपना बचाव करते हुए कहा कि उस दौरान आठ डीएफओ कार्यरत थे, सिर्फ उनका नाम लेना गलत है।

आरोपी अधिकारी राजेंद्र कुमार हुड्डा ने “जाँच चल रही है” कहकर फोन काट दिया।

Share This Article
Leave a Comment