राजस्थान के ऊर्जा विभाग और विद्युत निरीक्षणालय में एक बड़े ‘लाइसेंस राज’ का पर्दाफाश हुआ है। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) की सख्ती के बाद हुई विभागीय जांच में नियमों को ताक पर रखकर ‘ए-क्लास’ इलेक्ट्रिकल लाइसेंस जारी करने का गंभीर मामला सामने आया है। जांच समिति की तथ्यात्मक रिपोर्ट (Factual Report) ने न केवल भ्रष्टाचार की कलई खोली है, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड से मूल फाइलों के गायब होने जैसे सनसनीखेज खुलासे भी किए हैं। वरिष्ठ विद्युत निरीक्षक द्वारा गठित समिति की इस रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि निजी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गई हैं।
सरकारी रिकॉर्ड से मूल फाइलें ही गायब
भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए विभाग में साक्ष्यों को मिटाने का भी खेल खेला गया। जांच समिति ने मुख्य रूप से दो फर्मों—मैसर्स भंवरिया कन्ट्रक्शन कंपनी और मैसर्स इण्डिया कॉमर्शियल सर्विसेज के लाइसेंसों की जांच की। जांच में सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि इन दोनों ही फर्मों से जुड़ी मूल पत्रावलियां (Original Files) कार्यालय के रिकॉर्ड से पूरी तरह गायब हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कड़ी आशंका जताई है कि साक्ष्यों को खुर्द-बुर्द करने के उद्देश्य से ही इन फाइलों को रिकॉर्ड से हटाया गया है।
मैसर्स भंवरिया कन्ट्रक्शन: नाम बदला और तोड़े गए नियम
जांच में ‘मैसर्स भंवरिया कन्ट्रक्शन कंपनी’ को लेकर कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। इस फर्म का नाम बदलकर ‘M/s Bhawariya Infra Projects Private Limited’ कर दिया गया और नियमों के विरुद्ध जाकर ऑफलाइन लाइसेंस जारी कर दिया गया। यह राजस्थान सरकार के 2016 के गजट नोटिफिकेशन के नियम 13(2) का सीधा उल्लंघन है, जिसके अनुसार फर्म के प्रारूप में इस तरह का बदलाव कर लाइसेंस जारी करना अनुचित है। हद तो तब हो गई जब साल 2021 में इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों को ही दोबारा 2024 में नवीनीकरण (Renewal) के लिए लगा दिया गया। रिपोर्ट में विभाग के ऑनलाइन ईआईडी पोर्टल (EID Portal) पर भी दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ का स्पष्ट संकेत दिया गया है।
मैसर्स इण्डिया कॉमर्शियल सर्विसेज: बिना पात्रता के ‘क्लास-A’
दूसरी फर्म ‘मैसर्स इण्डिया कॉमर्शियल सर्विसेज’ पर भी बिना किसी पात्रता जांच के मेहरबानी की गई। इस फर्म को ‘क्लास-A’ श्रेणी में अपग्रेड कर दिया गया, जबकि जांच में पाया गया कि यह क्लास-A की अनिवार्य शर्तें ही पूरी नहीं करती थी। इसके मूल स्वरूप को बदलकर इसे साझेदारी फर्म के रूप में दिखाया गया और महज अनुभव के आधार पर लाइसेंस जारी कर दिया गया, जो सीधे तौर पर राज्य सरकार की अधिसूचनाओं का उल्लंघन है।
भ्रष्ट अधिकारियों पर गाज गिरना तय
जांच समिति के स्पष्ट निष्कर्षों के अनुसार, तत्कालीन सक्षम अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए नियमों के विपरीत जाकर व्यक्ति विशेष को अनुचित लाभ पहुंचाया है। प्रक्रियाओं में पारदर्शिता का घोर अभाव था। सहायक शासन सचिव (ऊर्जा विभाग) को भेजी गई इस रिपोर्ट के बाद अब संबंधित भ्रष्ट अधिकारियों और दोनों फर्मों पर कड़ी कार्रवाई होना तय माना जा रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के इस मामले में संज्ञान लेने के बाद से पूरे ऊर्जा विभाग में हड़कंप मचा हुआ है।
