जयपुर | EXPOSE NOW INVESTIGATIVE DESK
राजस्थान के प्रशासनिक गलियारों में कभी जिस नाम की तूती बोलती थी, जिसके रसूख के आगे बड़े-बड़े नतमस्तक होते थे, आज वह नाम पुलिस की फाइलों में एक ‘शातिर भगोड़ा’ बनकर दर्ज हो चुका है। करोड़ों रुपये के जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले के मुख्य आरोपी और प्रदेश के पूर्व वरिष्ठ IAS अधिकारी सुबोध अग्रवाल ने गिरफ्तारी से बचने के लिए फरारी काटने का जो अभूतपूर्व तरीका अपनाया है, उसने राजस्थान एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की रातों की नींद उड़ा दी है।

‘Expose Now’ की विशेष खोजी रिपोर्ट में सामने आया है कि कैसे एक समय लाल बत्ती और 21 तोपों की सलामी (प्रतीकात्मक रसूख) का आनंद लेने वाला यह अधिकारी आज अपनी पहचान छिपाने के लिए ‘ऑटो रिक्शा’ की सवारी करने को मजबूर है, लेकिन उसकी यह फरारी किसी हॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है।
शातिर माइंड: जब ‘साहब’ बने प्रोफेशनल क्रिमिनल
ACB की जांच में सुबोध अग्रवाल की फरारी को लेकर जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते अग्रवाल सर्विलांस, ट्रैकिंग और पुलिसिया कार्यप्रणाली को बखूबी समझते हैं। इसी ज्ञान का इस्तेमाल वे अब एक ‘प्रोफेशनल क्रिमिनल’ की तरह कानून को गच्चा देने में कर रहे हैं।
वाहनों का मायाजाल: 60 से ज्यादा गाड़ियां बदलीं
पहचान छिपाने और अपनी लोकेशन को लगातार भ्रमित रखने के लिए सुबोध अग्रवाल अब तक 60 से ज्यादा गाड़ियां बदल चुके हैं। ACB सूत्रों के मुताबिक, वे “एक गाड़ी, एक इस्तेमाल” (One vehicle, few hours use) की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वे किसी भी वाहन का इस्तेमाल चंद घंटों से ज्यादा नहीं करते, ताकि यदि एजेंसी किसी गाड़ी को ट्रैक भी कर ले, तो वह उन तक न पहुँच सके।
ऑटो रिक्शा बना ‘अभेद्य’ ढाल
इस फरारी का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘ऑटो रिक्शा’ का इस्तेमाल है। अग्रवाल ने अब तक 40 से ज्यादा बार ऑटो रिक्शा का सहारा लिया है। भीड़भाड़ वाले शहरी इलाकों में ऑटो का इस्तेमाल करना उनकी एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है। वे जानते हैं कि हाई-वे नाकाबंदी या हाई-टेक सीसीटीवी कैमरों की नजर अक्सर बड़ी लग्जरी गाड़ियों पर होती है। ऑटो रिक्शा भीड़ में आसानी से खो जाते हैं और उनकी चेकिंग भी लग्जरी वाहनों की तुलना में कम होती है।
हवाई यात्रा बंद, सड़क मार्ग ही सहारा
सुबोध अग्रवाल के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी हो चुका है, जिसके कारण उनके लिए हवाई यात्रा के सारे रास्ते बंद हैं। रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर भी सादे कपड़ों में ACB के जवान तैनात हैं। ऐसे में, अग्रवाल छोटे वाहनों, ऑटो और अपने निजी संपर्कों के जरिए केवल सड़क मार्ग से ही एक ठिकाने से दूसरे ठिकाने पर जा रहे हैं।
ब्यूरोक्रेसी का ‘अभेद्य किला’: क्या ‘खाकी’ और ‘खादी’ का मिल रहा है साथ?
‘Expose Now’ की टीम ने जब यह पड़ताल की कि आखिर क्यों ACB की 6 विशेष टीमें एक रिटायर्ड अधिकारी को पकड़ने में लगातार नाकाम साबित हो रही हैं, तो होश उड़ाने वाले आंकड़े सामने आए। क्या इस नाकामी का जवाब सुबोध अग्रवाल के अत्यंत प्रभावशाली और उच्च पदस्थ फैमिली नेटवर्क में छिपा है?
सुबोध अग्रवाल का ‘पावरहाउस’ परिवार (An IAS/IPS Powerhouse):
अग्रवाल का परिवार भारतीय नौकरशाही के सर्वोच्च पदों पर काबिज है, जो उन्हें व्यवस्था के भीतर एक ‘अभेद्य सुरक्षा कवच’ प्रदान करता है:
- पत्नी (रोली अग्रवाल): दिल्ली में IRS, चीफ कमिश्नर के पद पर तैनात।
- बेटा (शुभम अग्रवाल): मुंबई में IRS अधिकारी।
- भाई: खुद भी रिटायर्ड IAS अधिकारी।
- साला और साली की पत्नी: भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और IG रैंक के अधिकारी।
- साली और उनके पति: दोनों भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी।
- ससुर: रिटायर्ड IRS अधिकारी।
Expose Now का तीखा सवाल
जब एक आरोपी के परिवार के 10 से ज्यादा सदस्य IAS, IPS और IRS जैसे देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे हों, तो क्या यह मुमकिन नहीं कि सिस्टम के भीतर से ही सुबोध अग्रवाल को ACB के ‘मूवमेंट’ और ‘छापेमारी’ की ‘गुप्त सूचनाएं’ लीक की जा रही हों? यह रसूख ही शायद वह वजह है जिसके चलते अग्रवाल अब तक कानून के हाथ से दूर हैं। ACB अब मजबूरन इन सभी रसूखदार रिश्तेदारों के संपर्कों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और उनके मूवमेंट की भी पड़ताल कर रही है।
सोहना से जयपुर तक ‘नाकाम’ छापेमारी: ‘धूम’ स्टाइल स्केप
एसीबी को हाल ही में पुख्ता इनपुट मिला था कि अग्रवाल हरियाणा के सोहना में एक रसूखदार उद्योगपति के फार्म हाउस पर छिपे हैं। एसीबी ने पूरी तैयारी के साथ वहां रेड की। लेकिन, शातिर सुबोध को शायद इसकी भनक पहले ही लग चुकी थी। जब तक टीमें फार्म हाउस के गेट पर पहुँचीं, अग्रवाल एक बार फिर वहां से ‘ऑटो’ पकड़कर ओझल हो चुके थे—बिल्कुल फिल्म ‘धूम’ के शातिर चोर की तरह।
इसके बाद जयपुर में भी राजस्थान क्रिकेट अकादमी से जुड़े मुकुंद रूंगटा के फार्म हाउस पर भारी पुलिस फोर्स के साथ सर्च ऑपरेशन चलाया गया, लेकिन वहां भी ACB के हाथ खाली रहे।
जनता का पैसा और ‘नल’ का दर्द
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘जल जीवन मिशन’ का मुख्य मकसद राजस्थान के प्यासे और दूरदराज के गांवों तक नल से पानी पहुँचाना था। लेकिन सुबोध अग्रवाल जैसे आला अधिकारियों ने, जिन पर इस मिशन को लागू करने की जिम्मेदारी थी, कथित तौर पर इस मिशन को ‘धन जीवन मिशन’ बना दिया।
घटिया पाइपों की सप्लाई, फर्जी बिलिंग और करोड़ों रुपये के कमीशन के खेल ने राजस्थान की जनता के हक पर डाका डाला है। यह घोटाला न केवल आर्थिक है, बल्कि उन करोड़ों ग्रामीणों के साथ विश्वासघात है जो आज भी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं।
Expose Now Verdict
आज सुबोध अग्रवाल भले ही गाड़ियां बदलकर, ऑटो में छिपकर और अपने रसूखदार पारिवारिक नेटवर्क के दम पर कानून को गच्चा दे रहे हों, लेकिन 60 गाड़ियों का यह ‘धूम’ स्टाइल सफर अंततः जेल की सलाखों तक ही जाना है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या राजस्थान की भजनलाल सरकार इन ‘रसूखदार रिश्तेदारों’ के अदृश्य दबाव में आएगी या भ्रष्टाचार के इस ‘अभेद्य किले’ को ध्वस्त कर एक नजीर पेश करेगी? जनता की नजरें अब सरकार और ACB की अगली चाल पर टिकी हैं।
