राजधानी जयपुर की सड़कों पर इन दिनों विज्ञापनों की चमक नहीं, बल्कि ‘खतरे की रोशनी’ फैल रही है। नगर निगम द्वारा बिना किसी ठोस अध्ययन और सुरक्षा आकलन के सड़कों के किनारे धड़ल्ले से डिजिटल एलईडी विज्ञापन लगाए जा रहे हैं। भोपाल जैसे शहरों में पहले ही इसे दुर्घटनाओं का बड़ा कारण माना जा चुका है, इसके बावजूद जयपुर में नियमों को ताक पर रखकर यह प्रयोग जारी है।
अवैध स्क्रीन का खेल और निगम की चुप्पी
जयपुर के अपेक्स सर्कल और रामलीला मैदान जैसे व्यस्त इलाकों में फुटपाथ छोड़कर सीधे सड़क सीमा के भीतर अवैध एलईडी डिस्प्ले लगा दिए गए हैं। ‘वैध’ की आड़ में अवैध स्क्रीन लगाने का यह खेल जोरों पर है और निगम प्रशासन मौन साधे बैठा है। ट्रैफिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क पर चलते समय ड्राइवर का ध्यान एक क्षण के लिए भी भटकना जानलेवा साबित हो सकता है।
राजस्व का गणित: 3 करोड़ के लिए 100 करोड़ का दांव
इस खेल के पीछे का आर्थिक गणित भी चौंकाने वाला है। निगम को होर्डिंग, बीओटी और अन्य विज्ञापन साइटों से सालाना लगभग 100 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है। अधिकारियों का मानना है कि एलईडी स्क्रीन को बढ़ावा देने से पुराने विज्ञापन माध्यमों की सेल कम हो जाएगी। यानी निगम महज 3 करोड़ रुपये की तत्काल आय के लिए 100 करोड़ रुपये के बड़े राजस्व को खतरे में डाल रहा है।
विशेषज्ञों ने दी चेतावनी: “दुर्घटनाओं को न्योता”
इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि इस प्रकार की स्क्रीन सड़क की दृश्यता (Visibility) को प्रभावित करती हैं। विशेष रूप से व्यस्त चौराहों, सिग्नलों और मोड़ के पास ऐसी स्क्रीन लगाना किसी बड़े हादसे को आमंत्रण देना है।
जनता की राय: “चहेतों को फायदा पहुंचाने का लालच”
पूर्व नेता प्रतिपक्ष गिरराज खंडेलवाल ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “नगर निगम ने कमाने और चहेतों को फायदा पहुंचाने के लालच में सड़कों पर मौत का डिजिटल खेल चालू कर दिया है। रामबाग चौराहे को एलईडी से पाट दिया गया है। जब हादसे होंगे, तो निगम पल्ला झाड़ लेगा।”
