फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को ‘आमलकी एकादशी’ (Amalaki Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। यह पवित्र एकादशी महाशिवरात्रि और होली के ठीक मध्य में आती है (अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार फरवरी या मार्च के महीने में)।
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का जितना महत्व है, उतना ही महत्व इस व्रत को सही समय और सही विधि से खोलने (पारण करने) का भी है। आइए जानते हैं एकादशी व्रत के पारण से जुड़े कुछ बेहद जरूरी और कड़े नियम:
व्रत का ‘पारण’ क्या है और इसका सही समय क्या होना चाहिए?
एकादशी के व्रत को विधिपूर्वक समाप्त करने की प्रक्रिया को ‘पारण’ कहा जाता है।
- पारण का समय: एकादशी व्रत का पारण हमेशा अगले दिन (द्वादशी तिथि को) सूर्योदय के बाद किया जाता है।
- जरूरी नियम: व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक माना गया है। यदि किसी कारणवश द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो गई हो, तो भी एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही किया जाता है।
- पाप के समान है यह गलती: शास्त्रों के अनुसार, द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान माना जाता है, इसलिए समय का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
‘हरि वासर’ में भूलकर भी न खोलें व्रत
व्रत पारण में ‘हरि वासर’ (Hari Vasara) का विशेष ध्यान रखा जाता है।
- हरि वासर के दौरान एकादशी का व्रत कभी नहीं तोड़ना चाहिए।
- हरि वासर क्या है?: यह द्वादशी तिथि की पहली एक-चौथाई (1/4) अवधि होती है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को पारण करने से पहले इस अवधि के समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
- सर्वोत्तम समय: व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल (सुबह) का होता है।
- मध्याह्न (दोपहर) का नियम: श्रद्धालुओं को मध्याह्न (दोपहर) के समय व्रत खोलने से बचना चाहिए। यदि किसी कारण से प्रातःकाल पारण नहीं कर पाए हैं, तो मध्याह्न बीत जाने के बाद ही पारण करना चाहिए।
जब लगातार दो दिन हो एकादशी, तो क्या करें?
कई बार तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण एकादशी व्रत लगातार दो दिनों तक पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में व्रत के नियम अलग-अलग होते हैं:
- स्मार्त परिवार: जब एकादशी दो दिन की होती है, तो स्मार्त-परिवारजनों (गृहस्थों) को पहले दिन एकादशी का व्रत करना चाहिए।
- दूजी या वैष्णव एकादशी: दूसरे दिन वाली एकादशी को ‘दूजी एकादशी’ कहा जाता है। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखने वाले श्रद्धालुओं को इसी दूसरे दिन (दूजी एकादशी) व्रत करना चाहिए। जब भी एकादशी दो दिन की होती है, तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन पड़ती हैं।
भगवान विष्णु के परम भक्तों के लिए सलाह: जो भक्त भगवान विष्णु के प्रति अगाध प्रेम, स्नेह और भक्ति रखते हैं, उन्हें दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।
