जयपुर | राजस्थान में शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत मुफ्त शिक्षा का सपना देख रहे हजारों मासूमों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। प्रदेश में 20 फरवरी से आरटीई प्रवेश के लिए ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया शुरू होनी थी, लेकिन निजी स्कूल संगठनों ने सरकार के खिलाफ ‘आर-पार’ की जंग का ऐलान कर दिया है। स्कूल संचालकों का स्पष्ट कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे इस सत्र में एक भी नया दाखिला नहीं लेंगे।
क्यों अड़े हैं निजी स्कूल? (विवाद के 2 बड़े कारण)
निजी स्कूलों और शिक्षा विभाग के बीच टकराव की मुख्य वजह आर्थिक और नीतिगत है:
- पुनर्भरण राशि का मुद्दा: स्कूलों का दावा है कि सरकार प्रति छात्र केवल 13,000 रुपये का भुगतान करती है, जबकि महंगाई के दौर में वास्तविक खर्च इससे कहीं ज्यादा है। साथ ही, पिछले कई सत्रों का भुगतान बकाया होने से स्कूलों की आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है।
- एंट्री लेवल कक्षा का पेच: आरटीई के तहत प्रवेश केवल एक ‘एंट्री लेवल’ कक्षा में हो या सभी चारों प्री-प्राइमरी कक्षाओं में, इस पर कानूनी खींचतान जारी है। स्कूल इसे केवल एक कक्षा तक सीमित रखना चाहते हैं।
44 हजार बच्चों का भविष्य अधर में
इस विवाद का सबसे दर्दनाक पहलू उन बच्चों का है, जिनका चयन पिछले सत्र (2024-25) में हो चुका था। करीब 44,000 बच्चे ऐसे हैं जिन्हें लॉटरी में नाम आने के बावजूद स्कूलों ने अब तक दाखिला नहीं दिया है। शिक्षा विभाग के नोटिस भी बेअसर साबित हो रहे हैं, जिससे अभिभावक परेशान हैं।
