-ACB पूछताछ में ‘अपनों’ पर बरसे सुबोध अग्रवाल, सुधांश पंत पर दागे सवालों के गोले !
जयपुर। जल जीवन मिशन (JJM) महाघोटाले में घिरे सेवानिवृत्त आईएएस सुबोध अग्रवाल की रणनीति अब पूरी तरह से ‘लीगल और डिफेंसिव’ मोड पर आ गई है। सूत्रों के मुताबिक, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के सामने आत्मसमर्पण करने या गिरफ्तारी से पहले अग्रवाल ने दिग्गज वकीलों की फौज के साथ मैराथन चर्चा की। अब एसीबी की पूछताछ में अग्रवाल की जुबान से जो भी शब्द निकल रहे हैं, वे दरअसल वकीलों द्वारा तैयार की गई एक सोची-समझी स्क्रिप्ट का हिस्सा हैं।
वकीलों का ‘गुरुमंत्र’, “जितने नाम, उतना कमजोर केस”
अग्रवाल को कानूनी सलाहकारों ने एक साफ रणनीति दी है: “भीड़ बढ़ाओ, केस सुलझाओ।” तकनीकी और प्रशासनिक गलियारों में यह माना जाता है कि जांच के दायरे में जितने ज्यादा उच्चाधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा, अभियोजन (Prosecution) के लिए दोष सिद्ध करना उतना ही जटिल हो जाएगा। यही कारण है कि अग्रवाल अब सुधांश पंत जैसे नामों को बीच में लाकर जांच की दिशा को भटकाने और उसे ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ के जाल में उलझाने की कोशिश कर रहे हैं।

एसीबी की एफआईआर पर संशय के बादल
इस पूरे प्रकरण में अब एसीबी की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। चर्चा है कि एसीबी ने जेजेएम के दो अलग-अलग भ्रष्टाचार के मामलों को एक ही FIR में समाहित कर दिया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह तकनीकी चूक अग्रवाल के लिए ‘वरदान’ साबित हो सकती है। बड़ा सवाल ये है कि क्या एसीबी ने यह गलती अनजाने में की है, या फिर यह सुबोध अग्रवाल को बचाने की कोई सोची-समझी ‘सेफ एग्जिट’ गली है? कानूनन, दो अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए ताकि साक्ष्यों का मिलान स्पष्ट हो सके। एक ही एफआईआर होने से कानूनी ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के विरोधाभास का फायदा आरोपी को मिल सकता है।
सुबोध का ‘रक्षणात्मक वार’, “सिर्फ मैं ही क्यों?”
पूछताछ के दौरान सुबोध अग्रवाल ने खुद को पीड़ित और सतर्क अधिकारी के तौर पर पेश करते हुए सीधे तौर पर व्यवस्था की ईमानदारी पर सवाल उठाए हैं। उनके बयानों का लब्बोलुआब यह है कि यदि भ्रष्टाचार हुआ है, तो इसकी जवाबदेही की जद में वे सभी अधिकारी आने चाहिए जिन्होंने उन विवादित फाइलों पर हस्ताक्षर किए थे। जल जीवन मिशन की फाइलें अब केवल भ्रष्टाचार की कहानी नहीं कह रही हैं, बल्कि राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी के भीतर मचे घमासान और अंतर्विरोधों को भी उजागर कर रही हैं।
सुधांश पंत पर सीधा निशाना
अग्रवाल ने स्पष्ट रूप से जलदाय विभाग के तत्कालीन अधिकारियों का नाम लेकर यह संकेत दिया है कि तकनीकी स्तर पर होने वाली धांधली में उनकी भूमिका की जांच अनिवार्य है। लेकिन सबसे चौंकाने वाला रुख मुख्य सचिव सुधांश पंत को लेकर रहा। अग्रवाल के तेवर यह साफ कर रहे हैं कि वे इस मामले में अकेले बलि का बकरा बनने को तैयार नहीं हैं और प्रशासनिक ढांचे की ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ का कार्ड खेल रहे हैं।
अग्रवाल का तर्क: “अगर व्यवस्था पाक-साफ है, तो उन चेहरों को जांच से बाहर क्यों रखा जा रहा है जिनके कार्यकाल में टेंडर की प्रक्रियाएं परवान चढ़ीं? क्या जिम्मेदारी केवल शीर्ष पर बैठे व्यक्ति की है, या उनकी भी जिन्होंने तकनीकी आधार तैयार किया?”
Expose Now विश्लेषण: चक्रव्यूह या बचाव द्वार?
सुबोध अग्रवाल के पास वकीलों की फौज है और एसीबी की फाइल में ‘तकनीकी झोल’। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 900 करोड़ रुपये का यह महाघोटाला व 20 हजार करोड़ के टेंडरों की सौदेबाजी का खेल केवल बयानों की तीरंदाजी और फाइलों की हेराफेरी में दबकर रह जाएगा?
