राजस्थान पुलिस की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को चुनौती देते हुए कोटा ग्रामीण में भ्रष्टाचार का एक रूह कंपा देने वाला मामला सामने आया है। चेचट थाने के एक सर्किल इंस्पेक्टर (CI) और एक कॉन्स्टेबल पर आरोप है कि उन्होंने एक नाबालिग के अवैध गर्भपात (Abortion) जैसे जघन्य अपराध को मात्र 7 लाख रुपये की घूस लेकर रफा-दफा कर दिया। मामले का खुलासा होने के बाद कोटा ग्रामीण एसपी सुजीत शंकर ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी CI सुरेन्द्र सिंह और कॉन्स्टेबल महावीर को तत्काल प्रभाव से लाइन हाजिर कर दिया है।
किडनैपिंग से शुरू हुआ ‘डील’ का सफर
घटना की शुरुआत कोटा ग्रामीण के एक गांव से हुई, जहाँ एक युवक एक नाबालिग लड़की को भगा ले गया था। जुलाई 2024 में पुलिस ने दोनों को मध्य प्रदेश के सीहोर से दस्तयाब किया था। जांच के दौरान पता चला कि युवक और नाबालिग सीहोर के ‘मां नर्मदा हॉस्पिटल’ गए थे, जहाँ अस्पताल के मालिक डॉ. आजाद ने बिना किसी कानूनी दस्तावेज के नाबालिग का अवैध गर्भपात किया था।
थाने में पूछताछ और होटल में ‘डील’
2 मार्च 2026 को कॉन्स्टेबल महावीर और अन्य पुलिसकर्मी डॉ. आजाद को हिरासत में लेकर कोटा आए। यहाँ रक्षक अपनी शपथ भूलकर वसूली पर उतर आए:
- धमकी का खेल: थाने में CI ने पूछताछ की, जिसके बाद कॉन्स्टेबल महावीर ने डॉक्टर को अलग ले जाकर 8 लाख रुपये की डिमांड की। डॉक्टर को जेल भेजने और अस्पताल का लाइसेंस निरस्त कराने की धमकी दी गई।
- किस्तों में पेमेंट: सौदा 7 लाख रुपये में तय हुआ। डॉक्टर ने अपने दोस्तों से 6.50 लाख रुपये मंगवाए, जिसे कॉन्स्टेबल महावीर ने ‘होटल मालदार’ ले जाकर वसूला। बाकी के 50 हजार रुपये 8 मार्च को थाने के स्वागत कक्ष (Reception) में ही थमा दिए गए।
गंभीर अपराध की अनदेखी: ₹7 लाख के आगे कानून बौना?
जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि नाबालिग का गर्भपात करना एक गंभीर और गैरकानूनी कृत्य है। पुलिस ने डॉक्टर को दो बार थाने बुलाया, डॉक्टर वहां काफी देर तक रुका भी, लेकिन घूस की रकम मिलते ही उसे बिना किसी कार्रवाई के घर जाने दिया गया। डीएसपी घनश्याम मीणा की जांच रिपोर्ट में इन सभी तथ्यों की पुष्टि हुई है, जिसके बाद एसपी ने कड़ा रुख अपनाया है।
वर्तमान स्थिति: आरोपी युवक फिलहाल फरार है और मामला अदालत में विचाराधीन है। लेकिन पुलिसकर्मियों की इस करतूत ने पूरे महकमे की छवि पर दाग लगा दिया है।
