अफसरों की ‘सेटिंग’ से खड़ी हुईं अवैध इमारतें! सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की राजधानियों में जांच के दिए आदेश
-सिस्टम की नाक के नीचे चल रहा था खेल, अब रसूखदारों और अफसरों की आएगी शामत !
-राजधानी जयपुर सहित प्रदेश के बड़े शहरों में ‘अवैध साम्राज्य’ पर गिरेगी गाज !
जयपुर। देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिससे देशभर के भ्रष्ट अधिकारियों और अवैध निर्माण करने वाले ‘माफियाओं’ में हड़कंप मच गया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब रिहायशी इलाकों (Residential Areas) में अवैध कारोबार करने वालों की खैर नहीं। यह पूरा मामला एक अवैध इमारत से जुड़ा हुआ है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “एक पूरी डेढ़ मंजिला इमारत बन गई और अधिकारियों ने इस पर ध्यान तक नहीं दिया… यह स्थिति के चिंताजनक होने का संकेत देता है, क्योंकि यह नगर निगम अधिकारियों की मिलीभगत और साठगांठ के बिना संभव नहीं हो सकता था।” उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में, अनधिकृत निर्माण के स्थानीय विवाद को भवन उपनियमों (building bye-laws) के उल्लंघन और आवासीय क्षेत्रों के अवैध व्यवसायीकरण की अखिल भारतीय जांच में बदल दिया।
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानियों के नगर निकायों को व्यापक जांच करने का निर्देश दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि “समाज के बेईमान तत्वों द्वारा किए गए ऐसे दुरुपयोग के पर्यावरणीय और नागरिक परिणाम समान रूप से गंभीर हैं और इनके दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं।”

यह मामला एक व्यक्ति, लोकनाथन द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) से शुरू हुआ था, जिसमें उसने अपने अनधिकृत भूतल-प्लस-एक-मंजिल (ground-plus-one) निर्माण के खिलाफ पारित विध्वंस आदेश को चुनौती दी थी। याचिका को पहले ही खारिज करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने सवाल किया था कि नगर निगम अधिकारियों की जानकारी और मिलीभगत के बिना पूरी संरचना कैसे खड़ी की जा सकती है। इसके बाद, ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन द्वारा दायर एक हलफनामे में दोष मढ़ते हुए कहा गया कि निर्माण अवधि के दौरान यह स्थल माधवराम नगर पालिका के अधिकार क्षेत्र में आता था।
अदालत के सामने प्राथमिक प्रश्न यह था कि देश भर में भवन उपनियमों और भूमि-उपयोग नियमों के व्यापक और खुले उल्लंघन को प्रभावी ढंग से कैसे रोका जा सकता है। अदालत से उन राज्य सरकार के आदेशों की वैधता और औचित्य की जांच करने के लिए भी कहा गया था, जो उन व्यक्तियों को दंडात्मक कार्रवाई से व्यापक सुरक्षा प्रदान करते हैं जिन्होंने वैधानिक भवन मानदंडों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया है।
एक छोटी सी अपील और खुल गया ‘पेंडोरा बॉक्स’:-
यह मामला चेन्नई के एक शख्स ‘लोकनाथन’ की याचिका से शुरू हुआ था। उसने अपने अवैध निर्माण को बचाने के लिए गुहार लगाई थी, लेकिन जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इसे पूरे देश के लिए एक नजीर बना दिया।
कोर्ट के रडार पर क्या है?
-अवैध कमर्शियल इस्तेमाल: घरों के बीच में दुकानें, शोरूम और गोदाम खोलकर जो लोग शांति भंग कर रहे हैं, उनकी अब लिस्ट बनेगी।
-नगर निगम की मिलीभगत: कोर्ट ने माना है कि बिना अधिकारियों की ‘सेटिंग’ के ईंट भी नहीं रखी जा सकती।
-सरकारी संरक्षण: तमिलनाडु सरकार के उस आदेश पर कोर्ट ने भारी नाराजगी जताई है, जिसमें नियम तोड़ने वालों को ‘सुरक्षा कवच’ देने की कोशिश की गई थी।
सिस्टम का ‘एक्सपोज़’, कोर्ट की 3 कड़वी बातें:-
साठगांठ का खेल: कोर्ट ने दो टूक कहा कि भारी निर्माण बिना अधिकारियों की मिलीभगत के असंभव है। यह मिलीभगत अब बेनकाब होगी। अवैध निर्माण सिर्फ पत्थर की दीवार नहीं है, यह ट्रैफिक, सीवर और आम जनता की सुख-शांति पर हमला है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, जयपुर समेत सभी राज्यों की राजधानियों के नगर निगमों को अब अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी।
देशभर के अवैध निर्माण व गतिविधियों की होगी जांच !
अब सभी राज्यों की राजधानियों में एक बड़ा सर्वे और जांच शुरू होगी। अगर आप भी किसी रिहायशी इलाके में अवैध शोरूम या गैर-कानूनी बिल्डिंग बनाकर बैठे हैं, तो सावधान हो जाइए। सुप्रीम कोर्ट का डंडा चलने वाला है और इस बार ‘साहब’ भी आपको नहीं बचा पाएंगे। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानी वाले शहरों के सभी नगर निगमों और नगर पालिकाओं को व्यापक जांच करने और उन चिह्नित आवासीय क्षेत्रों (Demarcated Residential Areas) की पहचान करने का निर्देश दिया, जिनका दुरुपयोग गैर-आवासीय उद्देश्यों (Non-residential purposes) के लिए किया जा रहा है।
15 मई तक अफसरों को देना होगा हिसाब !
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केवल आदेश ही नहीं दिया है, बल्कि डेडलाइन भी तय कर दी है। कोर्ट ने साफ निर्देश दिया है कि सभी संबंधित नगर निगमों और नगर पालिकाओं के कमिश्नरों को खुद शपथ पत्र (Affidavit) दाखिल करना होगा। वे अब छोटे कर्मचारियों पर जिम्मेदारी डालकर बच नहीं सकते। 15 मई, 2026 तक उन सभी इलाकों की पूरी सूची कोर्ट के सामने पेश करनी होगी जहाँ रिहायशी जमीनों का इस्तेमाल व्यापारिक (Commercial) कामों के लिए किया जा रहा है। इस मामले की अगली बड़ी सुनवाई 20 मई, 2026 को होगी, जहाँ कोर्ट इन रिपोर्टों की समीक्षा करेगा।
राजधानी जयपुर सहित प्रदेश के बड़े शहरों में ‘अवैध साम्राज्य’ पर गिरेगी गाज !
प्रदेश की राजधानी जयपुर सहित प्रदेश के तमाम बड़े शहरों में पिछले कुछ सालों में अवैध निर्माण और आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों की जो ‘बाढ़’ आई है, अब उस पर सुप्रीम कोर्ट का ‘पीला पंजा’ चलने की तैयारी है। वैशाली नगर, मानसरोवर, सी-स्कीम, राजा पार्क, मालवीय नगर पॉश इलाकों में रिहायशी पट्टों पर खुलेआम शोरूम, रेस्टोरेंट और ऑफिसों की भरमार है। तंग गलियों में बनी ऊंची इमारतें और बेसमेंट का व्यावसायिक उपयोग अब जांच के घेरे में होगा कोर्ट के आदेश के बाद अब जयपुर नगर निगम (Heritage/Greater) और जेडीए के उन अधिकारियों की लिस्टिंग होगी, जिनकी सरपरस्ती में नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब जयपुर के निगम कमिश्नरों को कोर्ट में हलफनामा देकर बताना होगा कि गुलाबी नगरी के किन-किन आवासीय क्षेत्रों को ‘बाजार’ बना दिया गया है।
EXPOSE NOW की राय:- नियम सबके लिए बराबर होने चाहिए। जब एक गरीब का ठेला हट सकता है, तो रसूखदारों की अवैध इमारतें क्यों खड़ी रहती हैं? सुप्रीम कोर्ट का यह रुख भ्रष्टाचार की जड़ों पर सीधा प्रहार है।
