प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, जिसे किसानों के लिए सुरक्षा कवच माना जाता है, जयपुर जिले के चाकसू क्षेत्र में ‘छलावा’ साबित हो रही है । चाकसू के कादेड़ा और आसपास के गांवों में एक ऐसा मामला सामने आया है जहाँ किसानों ने अपनी मेहनत से गेहूं और चने की फसल उगाई थी, लेकिन बीमा कंपनी के रिकॉर्ड में उनके खेतों में ‘सरसों’ का बीमा दर्ज कर दिया गया है । जब हाल ही में हुई ओलावृष्टि और तेज तूफान ने फसलों को तबाह किया, तब मुआवजे की उम्मीद में क्लेम करने पहुँचे किसानों के पैरों तले जमीन खिसक गई ।
कैसे हुआ यह ‘कागजी खेल’?
किसानों ने सहकारी समिति के माध्यम से फसली ऋण लिया था, जिसके साथ ही नियमनुसार प्रीमियम काटकर बीमा कर दिया गया था । प्रीमियम कटने के बाद किसान इस भरोसे में थे कि आपदा की स्थिति में उन्हें आर्थिक सुरक्षा मिलेगी । लेकिन क्लेम प्रक्रिया के दौरान पता चला कि उनकी वास्तविक फसल (गेहूं-चना) का बीमा ही नहीं हुआ, बल्कि रिकॉर्ड में फसल का विवरण ही बदल दिया गया है । यह गड़बड़ी किसी एक किसान के साथ नहीं, बल्कि क्षेत्र के कई किसानों के साथ सामने आई है ।
📊 योजना की प्रक्रिया और गड़बड़ी का गणित
योजना के तहत सहकारी समितियां ऋण वितरण के साथ ही प्रीमियम काटती हैं । प्रीमियम की दरें और मुआवजे का गणित कुछ इस प्रकार है:
| फसल श्रेणी | प्रीमियम दर (%) | संभावित मुआवजा (प्रति हेक्टेयर) |
| रबी फसलें (गेहूं, चना आदि) | 1.5% | ₹75,000 से ₹1,00,000+ |
| खरीफ फसलें | 2.0% | नुकसान के प्रतिशत के आधार पर |
| व्यावसायिक/बागवानी फसलें | 5.0% | बीमित क्षेत्र के आधार पर |
ऐसे खुली पोल किसानों ने नुकसान के 72 घंटे के भीतर सूचना भी दी, लेकिन गलत फसल दर्ज होने के कारण अब उन्हें क्लेम मिलने की उम्मीद खत्म होती नजर आ रही है । कादेड़ा निवासी अशोक खण्डेलवाल ने बताया कि उनके खेत में गेहूं है, लेकिन बीमा सरसों का कर दिया गया । इसी तरह भागीरथ रेगर, मोहनलाल, शंकर सिंह, दामोदर और किशोर सहित कई किसानों के साथ पोर्टल पर यही गड़बड़ी सामने आई है ।
💬 जिम्मेदारों के बयान: जिम्मेदारी किसकी?
क्षेत्र के अधिकारियों और पूर्व पदाधिकारियों ने इस मामले पर अलग-अलग तर्क दिए हैं:
“यदि फसल बीमा में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो मामले को उच्च अधिकारियों और कृषि मंत्री के समक्ष उठाया जाएगा और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।” — मदन चौधरी, चेयरमैन क्रय-विक्रय सहकारी समिति, चाकसू
“किसान को बीमा के लिए अपनी फसल की जानकारी देना आवश्यक होता है। यदि किसान जानकारी नहीं देता, तो समिति अपने स्तर पर फसल का चयन कर सकती है।” — शंकर सिंह, ऋण पर्यवेक्षक (समिति का बचाव करते हुए)
“यह किसानों के साथ सीधा छलावा है। इससे उन्हें न केवल आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ रही है।” — हिम्मत सिंह, पूर्व चेयरमैन, क्रय-विक्रय सहकारी समिति
