गुलाबी नगरी में लोक संस्कृति का सैलाब: 210 कलाकारों ने बिखेरी छटा, आज पारंपरिक मार्ग पर फिर निकलेगी माता की विदाई सवारी

जयपुर: गुलाबी नगरी जयपुर शनिवार को उस समय लोक संस्कृति और आस्था के चरम पर नजर आई, जब सिटी पैलेस के त्रिपोलिया गेट से गणगौर माता की शाही सवारी रवाना हुई। नगाड़ों की गूंज और शहनाई की मधुर तान के बीच निकली इस शोभायात्रा ने जयपुर के सांस्कृतिक वैभव का एक नया इतिहास रच दिया।

शाही ठाठ-बाट और लवाजमा

इस वर्ष की सवारी में 32 पारंपरिक लवाजमों ने चार चांद लगा दिए। सुसज्जित हाथी, ऊंटों का दल, शाही घोड़े और विक्टोरिया कैरिज के साथ पहली बार शामिल हुए ‘शंकर बैंड’ ने दर्शकों का विशेष ध्यान खींचा। सजी-धजी पालकियों में विराजी गणगौर माता के दर्शन के लिए त्रिपोलिया गेट से लेकर गणगौरी बाजार तक सड़कों, छतों और बालकनियों पर तिल रखने की जगह नहीं थी।

210 कलाकारों ने बांधा समां

शोभायात्रा की जान रहे 210 लोक कलाकार, जिन्होंने अपनी कला से उत्सव को जीवंत बना दिया।

  • प्रमुख नृत्य: कच्छी घोड़ी, गैर, कालबेलिया, चरी और घूमर की प्रस्तुतियों ने समां बांध दिया।
  • लोक संगीत: रावणहत्था और भपंग की धुनों ने विदेशी पर्यटकों को भी झूमने पर मजबूर कर दिया।

आज निकलेगी ‘बूढ़ी गणगौर’ की सवारी

महोत्सव का समापन रविवार को ‘बूढ़ी गणगौर’ की सवारी के साथ होगा। पर्यटन विभाग के उप निदेशक उपेंद्र सिंह शेखावत के अनुसार, यह सवारी शाम 5:45 बजे सिटी पैलेस से रवाना होगी।

रूट मैप: सिटी पैलेस ➔ त्रिपोलिया गेट ➔ छोटी चौपड़ ➔ गणगौरी बाजार ➔ तालकटोरा/पोंड्रिक पार्क।

फैक्ट बॉक्स: क्यों खास है बूढ़ी गणगौर?

  • यह गणगौर महोत्सव का अंतिम और विदाई का दिन होता है।
  • यह विवाहित महिलाओं के सौभाग्य और शिव-पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है।
  • जयपुर में इसे पारंपरिक और शाही अंदाज में विदा करने की सदियों पुरानी परंपरा है।
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