60 केस, 15 दिन और DEO की मुश्किल: क्या फाइलों में ही सिमट कर रह गई आबकारी विभाग की बड़ी कार्रवाई?

जयपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय के एक कड़े सवाल ने जयपुर जिला ग्रामीण आबकारी विभाग की पूरी कार्यप्रणाली को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है। विभाग ने दावा तो 60 बड़ी कार्यवाहियों का किया था, लेकिन अब उन्हीं दावों की सच्चाई साबित करना जिला आबकारी अधिकारी (DEO) राजेंद्र प्रसाद गर्ग के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसे केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि धरातल पर हुए एक्शन में दिलचस्पी है।

मौखिक दावों पर अदालत की घेराबंदी

इस पूरे मामले की जड़ें उस सुनवाई में हैं जहां विभाग की ओर से शराब लाइसेंस धारकों पर नकेल कसने की दलीलें दी जा रही थीं। जब कोर्ट ने पूछा कि नियमों के उल्लंघन पर कितनी FIR दर्ज हुईं, तो विभाग ने ’60’ का आंकड़ा पेश कर दिया। हालांकि, अदालत ने इन आंकड़ों को अंतिम मानने के बजाय यह सवाल खड़ा कर दिया कि अगर वाकई इतनी बड़ी संख्या में मुकदमे दर्ज हुए, तो उन पर अंतिम निर्णय क्या लिया गया। जस्टिस ने मौखिक जानकारी को पर्याप्त न मानते हुए विभाग को हर एक मामले का हिसाब देने का निर्देश दिया है।

लाइसेंस की शर्त संख्या 13.3 और विभाग की चुप्पी

सुनवाई के दौरान सबसे अधिक चर्चा आबकारी नियमों की ‘शर्त संख्या 13.3’ की रही। यह प्रावधान विभाग को वह मारक शक्ति देता है जिसके तहत FIR दर्ज होते ही संबंधित दुकान का लाइसेंस तुरंत प्रभाव से निरस्त किया जा सकता है। कोर्ट अब इसी बिंदु की गहराई से पड़ताल कर रहा है कि क्या विभाग ने इस शक्ति का उपयोग किया या फिर रसूखदारों को बचाने के लिए नियमों को दरकिनार कर दिया गया। विभागीय सुस्ती अब कानूनी सवालों के कठघरे में है।

14 दिनों की मोहलत और हलफनामे की तलवार

हाईकोर्ट ने DEO राजेंद्र प्रसाद गर्ग को अगले दो सप्ताह के भीतर एक विस्तृत हलफनामा पेश करने का अंतिम अवसर दिया है। इस दस्तावेज़ में विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि जिन 60 मामलों का जिक्र किया गया, उनमें से कितनों में लाइसेंस रद्द करने की हिम्मत दिखाई गई। जिन मामलों में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, उनके पीछे की वजह भी विभाग को बतानी होगी। कोर्ट के इस सख्त रुख ने आबकारी महकमे में हलचल तेज कर दी है।

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