एक तरफ देश डिजिटल इंडिया और हाई-टेक रेलवे की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय रेलवे के एकीकृत भुगतान प्रणाली (IPAS) में एक ऐसी तकनीकी खामी उजागर हुई है, जिसने पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया है। महज सॉफ्टवेयर कोडिंग में ‘डबल जीरो’ (00) की एक छोटी सी त्रुटि ने रेलवे के खजाने को लगभग 10,000 करोड़ रुपये की चपत लगा दी है।
क्या है ‘द बिग ग्लिच’?
रेलवे के पेमेंट सॉफ्टवेयर में यह गंभीर गड़बड़ी 9 से 11 मार्च 2026 के बीच सामने आई। तकनीकी खराबी के कारण भुगतान की जाने वाली राशि के पीछे सिस्टम ने स्वतः ही दो अतिरिक्त शून्य (00) जोड़ दिए। इसका परिणाम यह हुआ कि जिस ठेकेदार को लाखों में भुगतान होना था, उसके खाते में करोड़ों रुपये पहुंच गए।
जोधपुर और आगरा में ‘करोड़ों’ की बारिश गड़बड़ी के सबसे बड़े मामले राजस्थान के जोधपुर और उत्तर प्रदेश के आगरा मंडलों में देखने को मिले:
- जोधपुर डिवीजन: यहाँ ‘मैसर्स संजीव ब्रदर्स’ नाम की एक फर्म को नियमानुसार 35 लाख रुपये का भुगतान किया जाना था, लेकिन सॉफ्टवेयर की त्रुटि के कारण फर्म के खाते में सीधे 35 करोड़ रुपये जमा हो गए।
- आगरा मंडल: यहाँ रेल लाइन डबलिंग कार्य में लगी एक फर्म को 55 करोड़ रुपये का भुगतान स्वीकृत था, लेकिन सिस्टम ने दो शून्य बढ़ाकर उनके खाते में 5,500 करोड़ रुपये का ‘महा-उपहार’ भेज दिया।
तीन दिनों तक सोता रहा रेल मंत्रालय!
हैरानी की बात यह है कि यह भारी वित्तीय अनियमितता एक या दो घंटे नहीं, बल्कि पूरे तीन दिनों तक निर्बाध चलती रही। रेलवे के वित्तीय निगरानी दस्ते और उच्चाधिकारियों को इसकी भनक तब लगी जब 11 मार्च को नियमित ऑडिट किया गया। ऑडिट रिपोर्ट में आंकड़ों का मिलान न होने पर विभाग के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में रेलवे बोर्ड ने देशभर में उन सभी बैंक खातों को फ्रीज करने का आदेश दिया जिनमें 9 से 11 मार्च के बीच भुगतान हुआ था।
उच्च स्तरीय जांच के आदेश
रेलवे बोर्ड ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एक हाई-लेवल इंक्वायरी कमेटी का गठन किया है। जोधपुर और आगरा सहित कई रेल मंडलों के वरिष्ठ लेखा अधिकारियों (Accounts Officers) से जवाब तलब किया गया है। शुरुआती जांच में इसे तकनीकी कोडिंग की खामी माना जा रहा है, लेकिन विभाग इसे मानवीय साजिश के नजरिए से भी देख रहा है।
Expose Now के गंभीर सवाल:
- सिस्टम की सुरक्षा: क्या यह वास्तव में केवल एक तकनीकी खराबी थी, या इसके पीछे कोई संगठित सिंडिकेट सक्रिय था जिसने जानबूझकर भुगतान प्रणाली के साथ छेड़छाड़ की?
- वेरिफिकेशन का अभाव: इतने बड़े वित्तीय ट्रांजेक्शन के लिए क्या किसी अधिकारी के डिजिटल सिग्नेचर या मैन्युअल क्रॉस-चेक की व्यवस्था नहीं थी? क्या अरबों रुपये का सरकारी खजाना पूरी तरह से केवल एक सॉफ्टवेयर के भरोसे छोड़ दिया गया है?
- रिकवरी की चुनौती: खातों को फ्रीज तो कर दिया गया है, लेकिन जो राशि पहले ही निकाली जा चुकी है, उसकी शत-प्रतिशत वसूली रेलवे के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।
