Expose Now Exclusive: धनेश्वर में ‘खनन माफिया’ का महाघोटाला; आबादी भूमि और मुकंदरा पर संकट

By Admin

बूंदी/धनेश्वर: राजस्थान के बूंदी जिले में नेशनल हाईवे-27 पर स्थित धनेश्वर क्षेत्र से एक ऐसा प्रशासनिक और पर्यावरणीय घोटाला सामने आया है, जिसने पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। यहाँ नियमों को ताक पर रखकर, आवंटित लीज क्षेत्र से करीब 3 किलोमीटर दूर सीधे ग्रामीणों की आबादी भूमि में सैंड स्टोन (बलुआ पत्थर) का अवैध साम्राज्य खड़ा कर दिया गया है। करोड़ों रुपये के इस काले खेल में ग्राम पंचायत, राजस्व विभाग और खनिज विभाग की मिलीभगत के गंभीर आरोप लग रहे हैं, जिन्होंने कथित तौर पर भू-माफियाओं को फायदा पहुँचाने के लिए अपनी आँखें मूंद ली हैं।


आबादी भूमि और KDA रिकॉर्ड में सेंधमारी

धनेश्वर में संचालित हो रही इस अवैध खनन की गहराई सरकारी फाइलों और जमीनी हकीकत के बीच के बड़े अंतर को उजागर करती है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, बूंदी सिलिका कंपनी को लीज एग्रीमेंट संख्या 47/1994 के तहत 130.34 हेक्टेयर भूमि पर खनन की अनुमति दी गई थी, जिसकी समय सीमा 2040 तक है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि मौके पर खनन गतिविधियां इस निर्धारित क्षेत्र में न होकर, उससे 3 किलोमीटर दूर धनेश्वर की घनी आबादी वाले वार्ड 9, 10 और 11 में चल रही हैं। राजस्व रिकॉर्ड की मानें तो खसरा संख्या 162 और 267 की यह भूमि कोटा विकास प्राधिकरण (KDA) के नाम दर्ज है, जहाँ पिछले 40 वर्षों से ग्रामीण निवास कर रहे हैं।

ग्राम पंचायत और राजस्व विभाग पर मिलीभगत के आरोप

Gram Panchayat Dhaneshwar, Bundi

इस पूरे फर्जीवाड़े में ग्राम पंचायत धनेश्वर की भूमिका सबसे संदेहास्पद नजर आ रही है। 13 जून 2025 को सरपंच सत्यनारायण मेघवाल और सचिव मनोहर सिंह द्वारा तहसीलदार तालेड़ा को दी गई अनापत्ति (NOC) विरोधाभासों का पुलिंदा है। पंचायत ने एक तरफ तो इस बेशकीमती जमीन को ‘गैर-आबादी’ बताकर रिपोर्ट दी ताकि खनन का रास्ता साफ हो सके, वहीं दूसरी ओर उसी सरकारी पत्र में इसे ‘आबादी विस्तार’ के लिए प्रस्तावित भी कर दिया। इस दस्तावेजी धोखाधड़ी ने पंचायत प्रशासन को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा कर दिया है।

मुकंदरा टाइगर रिजर्व और वन्यजीवों पर गहराता संकट

पर्यावरणीय दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि यह मुकंदरा टाइगर रिजर्व की सीमा से मात्र 900 मीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ होने वाले भारी विस्फोट और उड़ती धूल न केवल वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए खतरा है, बल्कि इको-सेंसिटिव जोन के नियमों का भी खुला उल्लंघन है। शिकायतों के अंबार के बावजूद प्रशासन की चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े करती है कि आखिर आबादी भूमि में खनन की अनुमति किसने दी और बिना उचित मुआवजे के ग्रामीणों का विस्थापन कैसे संभव हुआ?

NGT नियमों की अनदेखी और ग्रामीणों का विस्थापन

नए मकानों में भी गहरी दरारें

खनन माफिया के रसूख का आलम यह है कि उन्होंने यहाँ रह रहे मूल निवासियों को बिना किसी वैधानिक मुआवजे या आवासीय पट्टे के ही विस्थापित कर दिया। कंपनी ने सैंड स्टोन निकालने के लालच में ग्रामीणों को हाईवे किनारे पक्के मकानों और दुकानों में तो बसा दिया, लेकिन उन्हें कोई मालिकाना हक नहीं दिया गया। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के सख्त नियमों के अनुसार, सार्वजनिक सड़क से 50 मीटर और ब्लास्टिंग वाले खनन के लिए 250 फीट की दूरी अनिवार्य है, लेकिन यहाँ सड़क से मात्र 20 मीटर की दूरी पर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। स्थानीय निवासी शंभू दयाल सुवालका का कहना है कि भारी विस्फोटों के कंपन से अब इन नए मकानों में भी गहरी दरारें आ गई हैं, जिससे लोग दहशत के साये में जीने को मजबूर हैं।

प्रशासन की चुप्पी और जन आक्रोश

खनिज विभाग के अभियंता प्रशांत बेडवाल ने खनन को वैध बताया है, हालांकि स्थानीय स्तर पर अन्य अधिकारी स्पष्ट जवाब देने से बचते नजर आ रहे हैं। वहीं, खान संचालक जयवर्धन बंसल का दावा है कि उनका एग्रीमेंट पुराना है और सभी दस्तावेज विभागीय पोर्टल पर उपलब्ध हैं। धनेश्वर में सामने आया यह मामला करोड़ों के अवैध खनन के साथ-साथ प्रशासनिक लापरवाही और ग्रामीणों के अधिकारों के उल्लंघन का एक बड़ा उदाहरण है। स्थानीय ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस महाघोटाले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो वे उग्र जन आंदोलन के लिए विवश होंगे।

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