ऐतिहासिक फैसला: FIR दर्ज न करना मौलिक अधिकारों का हनन; सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अधिकारी पर 2 लाख का जुर्माना बरकरार रखा

By Admin

नई दिल्ली: आम जनता को पुलिस की मनमानी और थानों के चक्कर काटने से बड़ी राहत देते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी किसी पीड़ित की शिकायत पर प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से इनकार करता है, तो यह केवल एक प्रक्रियात्मक चूक नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों और बुनियादी मानवाधिकारों का ‘घोर उल्लंघन’ है.

FIR न्याय की प्रक्रिया की ‘प्रथम और अनिवार्य कड़ी’ माननीय न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की पीठ ने 30 अप्रैल, 2025 को दिए अपने एक महत्वपूर्ण फैसले (सिविल अपील संख्या 6358/2025) में यह व्यवस्था दी. न्यायालय ने जोर देकर कहा कि FIR दर्ज करना न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया की “प्रथम और अनिवार्य कड़ी” है, जिससे किसी भी पीड़ित को वंचित नहीं किया जा सकता.

संविधान और मानवाधिकार कानून दोनों का हनन सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि FIR दर्ज न करना भारतीय संविधान के दो अत्यंत महत्वपूर्ण अनुच्छेदों का सीधा उल्लंघन है:

  1. अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार.
  2. अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार.

इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने इसे ‘मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993’ की धारा 2(d) के तहत परिभाषित ‘मानव अधिकार’ का सीधा हनन भी माना है. यह धारा व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और सम्मान से संबंधित अधिकारों की गारंटी देती है.

क्या था पूरा मामला?

यह मामला तमिलनाडु राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) के एक आदेश से उत्पन्न होकर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा था. श्रीविल्लिपुथुर टाउन पुलिस स्टेशन के एक पुलिस अधिकारी (अपीलकर्ता पावुलुरी सुधरसन) पर आरोप था कि उसने एक शिकायतकर्ता की FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया था. जाँच में यह भी पाया गया कि जब पीड़ित की मां शिकायत दर्ज कराने थाने गई, तो उक्त पुलिस अधिकारी ने उनके साथ गंदी भाषा का इस्तेमाल किया.

राज्य मानवाधिकार आयोग ने इसे पुलिस की शक्तियों का दुरुपयोग और मानवाधिकारों का गंभीर हनन मानते हुए, राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह पीड़ित को 2,00,000 रुपये (दो लाख रुपये) का मुआवजा दे. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि यह राशि दोषी पुलिस अधिकारी से वसूल की जाए.

पुलिस अधिकारी की दलीलें खारिज, कोर्ट ने लगाई फटकार

आरोपी पुलिस अधिकारी ने आयोग के इस आदेश को पहले उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी. उनके वकील का तर्क था कि FIR दर्ज करने से इनकार करना मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि अपराध की रिपोर्ट करने के लिए पुलिस स्टेशन आने वाले प्रत्येक नागरिक को मानवीय सम्मान के साथ व्यवहार किए जाने का अधिकार है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यह उसका मौलिक अधिकार है कि उसके साथ अपराधियों जैसा सलूक न किया जाए. अपीलकर्ता के आचरण को देखते हुए आयोग और उच्च न्यायालय के निर्णय को सही पाया गया.

आम जनता के लिए आशा की किरण

सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस अधिकारी की अपील खारिज करते हुए कहा कि आयोग के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. यह फैसला उन तमाम नागरिकों के लिए आशा की एक नई किरण है, जिनकी शिकायतों को थानों में अक्सर अनसुना कर दिया जाता है. यह निर्णय पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा.

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